लघु काल-चिन्तन ५३
"अन्तःपुरी"
कोई व्यक्ति बगीचे से गुजर जाए वहाँ खिले हुए फूलों को जरा भी न छुए फिर भी हवा में तैर रहे पराग कणों की सुगन्ध आवेगी ही, चाहे वृक्षों का स्पर्श न करें उनकी उत्पादित प्राणवायु जीवन के अणु ले कर वहाँ दौड़ती फिरती है।
यह अदृष्य मौन रह कर अपना काम करते रहते हैं। बहती हवा पत्तों की महीन सरसराहट शोर नहीं संगीत है नियति का। पहाड़ों के भीतर भी मृदुजल के अन्तर्प्रवाह मौजूद हैं। पेड़ों- पौधों के भीतर उपलब्ध ऊर्जा का प्रस्फुटन शाखों, पत्तों, फूलों, फलों के रूप में रूपान्तरित होती है। सब शान्त, मन्थर गति से चलता है।
तुम्हारे भीतर भी सुगन्ध के परमाणु उपलब्ध है, जो बाहर घटित हो रहा है वह आन्तरिक ऊर्जा के परम स्रोत का स्राव है। भीतर बाहर चल रहे अनहद(अनाहत) नाद में लिपटे शब्द और स्वर प्राणों की भेरियाँ बजाती है पर सुना नहीं कभी तुमने। सागर तल पर चल रहे उपद्रवों के शोर के नीचे एक धीर गंभीर मौन वाला क्षीरनिधि विराजमान है। ये उपद्रव मन के ऊपरी धरातल चल रहे विचारों, विकल्पों, तर्कों और भ्रमों के कारण है। इसी मन को निर्विचार, संकल्पवान, अतर्क्य और सुस्पष्ट बना कर देखो। ये निःशब्द भीतर के महाशून्य से प्रकट होते हैं। इनकी कोई भाषा नहीं है ये मात्र दिव्य अनुभूतियाँ हैं।
"अपने फन्द-कमन्द मन के द्वार पर ही छोड़ कर चलो अपने-अपने अन्तःपुर में अकेले अकेले"
रामनारायण सोनी
प्रतिक्रिया
श्री गौरीशंकर दुबे
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।
अपने अधीन किये हुए अन्त:करण वाले साधक की इन्द्रियाँ उसके वश में होती है और उनमें राग-द्वेष का अभाव होता है ऐसी इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ वह साधक अन्त:करण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है।
गीता के इसी संदेश का विवेचन आपके इस चिंतन में है।मन को निर्विचार, संकल्पवान्, सुस्पष्ट बनाने का आग्रह है।
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चिंतन का आधार
गुरवाणी में स्पष्ट किया है कि वहां अनहद वाणी बज रही है। जरूरत है उस स्थान को जानने की, जहां वह अनहद वाणी बज रही है।
पंच सखी मिलि मंगलु गाइआ।
अनहद बाणी नादु वजाइआ॥
जब अनहद वाणी का नाद हमारे अंतर में बजता है, तभी हमारे अंदर में हमारे पांचों मित्र-दया, क्षमा, शील, संतोष एवं सत्य प्रसन्न होकर हमारे लिए आनंद का मार्ग खोल देते हैं।
लेकिन यह अनहद वाणी कैसे प्राप्त होती है?
पूरे गुर ते महल पाइआ पति परगटु लोई। नानक अनहद धुनी दरि वजदे मिलिया हरि सोई॥
श्री गुरु अमरदास जी कहते हैं कि वहां अनहद वाणी बज रही है, वह धुन बज रही है। जब हमें प्रभु के परम तत्व ज्ञान की प्राप्ति होती है, इस संबंध में कहा है-
द्रिसटि भई तब भीतरि आइओ मेरा मनु अनदिनु सीतलागिओ।
कहु नानक रसि मंगल गाए सबदु अनाहदु बाजिओ॥
श्री गुरु अर्जुन देव जी कहते हैं कि जब अंतर्दृष्टि खुलती है तभी अंतर्जगत में प्रवेश कर मन को शांति मिलती है। तभी प्रभु के निर्मल गायन को जान सकते हैं, जब अनहद शब्द की ध्वनि सुनाई देती है।
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