आदरणीय सोनी जी,
सादर वन्दे।
आपकी कृति "जिन्दगी के केनवास"काव्य-संकलन पढ़ते ही मन प्रसन्न हो गया।इन कविताओं में गहन जीवन-दर्शन के साथ जिन्दगी के हर फलक को छूने की कोशिश की गई है।
ईश्वर की सर्वव्यापकता और उनके चरणों में अनुराग के लिए अपने मन को संबोधित करते हुए कवि की भावना है---
कण कण में सौन्दर्य उसी का
उस पावन का गान किए जा
रे मन-मधुप मौन तू रहकर
प्रभु पद-पद्म-पराग पिए जा।
""सबका सिरजनहार प्रभु तू""तथा""सोहं सोहं बोल""शीर्षक कविताएँ कबीरदास जी की शैली में है। इनमें हठयोग साधना द्वारा ब्रह्मरन्ध्र में अनहद नाद के असीम आनन्द की अनुभूति के लिए जीव से आग्रह है।
उपनिषद् के""द्वा सुपर्णा सयुजा सिखाया:----"तथा गीता के""द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च---""का भाव इन पंक्तियों में है--
एक डाल पर दो पंछी
खट्टे मीठे फल खाता तू
निज स्वरूप को भूला तू
अब सोहं सोहं बोल।
आपकी कविता में प्रभु के प्रति कृतज्ञता का भाव है--
तुम अकारण ही कृपा इस जीव पर जो कर रहे हो
यह रहे विश्वास अविचल,जब तलक जीवन रहे।
ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति--तथा जानत तुम्हहि तुम्हहि होई जाई का वेदान्त दर्शन इन पंक्तियों में देखिए---
यात्रा है स्वयं में लौटने की
तुममें खोना चाहता था।सो मैं खो गया।
कवि की वाणी की ताकत का चित्रण इन पंक्तियों में---
कवि जब उठ जाएगा
पाषाण पिघल जाएगा
हुंकार सुनेगा जब लोहा भी
खुद शोणित बन जाएगा।
माँ मेरा अभिमान तू--में माता के प्रति कृतज्ञता का भाव है।
मातृत्व बीज---में बेटी के प्रति सम्मान का भाव है जिसमें मातृत्व के बीज है। जिसमें नव संस्कृति के आकार ढल रहे हैं।
आतंकवाद--कविता में आतंक के विरुद्ध शक्ति के संधान का आह्वान है।
कविता ने जगा दिया---, में वैभव विलास के जीवन से हट कर दीन-हीन गरीबों के प्रति संवेदना का भाव है।
बरगद और वाशिंदे---में किसी को आश्रय दे कर, असहाय की सहायता करके आनन्दित होने का संदेश है।
यह पेड़ भी बड़ा अजीब है---में वृक्ष की पुकार है--
असमय मत मारो
मेरे बिन इस जग में कैसे जी पाओगे।
पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करने वाली रचना है।
लुढ़कते आँसू दरकते सवाल----कविता में मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति है--
उसे काँटा लगे तो यहाँ चुभन चाहिए।
जिन्दगी के नौ रंग---में सुख दु:ख,हर्ष शोक,त्याग, शांति,क्षमा, उदासी भरी जिंदगी के रंगों में कवि चाहता है--
रंग कोई भी रहे,नियति का यह मान है
धर्म की सद् राह चलना यही बस आन है।
राजपथ के राहियों से तोलना मत--कविता में धरा पर रहने वालोंं की शिखर पुरुषों से तुलना नहीं अर्थात् कवि जमीन से जुड़ा हुआ मानव है वह आम जन जीवन में घुल-मिल कर रहना चाहता है।
इसी प्रकार प्रेम, सामाजिक उत्थान, विश्वशांति, और जीवन के आदर्शों का संदेश देने वाली कविताएँ मन पर गहरा प्रभाव डालने वाली है।
आपकी कविताओं में अंतरंग अनुभूतियों की सहज अभिव्यक्ति है।जीवन के यथार्थ को आत्मपरक सत्य के रूप में उद् घाटित किया है।शब्द,भाव, भाषा, और अभिव्यक्ति की दृष्टि से आपकी यह कृति अद्वितीय है।
हो सकता है मैं आपकी कविताओं के भावों को सही रूप में नहीं समझ पाया हूँ ।फिर भी यथामति अपने विचार लिखने की धृष्टता की है।त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ।
हार्दिक शुभकामनाओं सहित।
भवदीय
गौरीशंकर दुबे।
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