Saturday, October 31, 2020

समीक्षक गौरीशंकर दुबे

लघु काल-चिन्तन ५३

"अन्तःपुरी"

कोई व्यक्ति बगीचे से गुजर जाए वहाँ खिले हुए फूलों को जरा भी न छुए फिर भी हवा में तैर रहे पराग कणों की सुगन्ध आवेगी ही, चाहे वृक्षों का स्पर्श न करें उनकी उत्पादित प्राणवायु जीवन के अणु ले कर वहाँ दौड़ती फिरती है।
यह अदृष्य मौन रह कर अपना काम करते रहते हैं। बहती हवा पत्तों की महीन सरसराहट शोर नहीं संगीत है नियति का। पहाड़ों के भीतर भी मृदुजल के अन्तर्प्रवाह मौजूद हैं। पेड़ों- पौधों के भीतर उपलब्ध ऊर्जा का प्रस्फुटन शाखों, पत्तों, फूलों, फलों के रूप में रूपान्तरित होती है। सब शान्त, मन्थर गति से चलता है।
तुम्हारे भीतर भी सुगन्ध के परमाणु उपलब्ध है, जो बाहर घटित हो रहा है वह आन्तरिक ऊर्जा के परम स्रोत का स्राव है। भीतर बाहर चल रहे अनहद(अनाहत) नाद में लिपटे शब्द और स्वर प्राणों की भेरियाँ बजाती है पर सुना नहीं कभी तुमने। सागर तल पर चल रहे उपद्रवों के शोर के नीचे एक धीर गंभीर मौन वाला क्षीरनिधि विराजमान है। ये उपद्रव मन के ऊपरी धरातल चल रहे विचारों, विकल्पों, तर्कों और भ्रमों के कारण है। इसी मन को निर्विचार, संकल्पवान, अतर्क्य और सुस्पष्ट बना कर देखो। ये निःशब्द भीतर के महाशून्य से प्रकट होते हैं। इनकी कोई भाषा नहीं है ये मात्र दिव्य अनुभूतियाँ हैं।
"अपने फन्द-कमन्द मन के द्वार पर ही छोड़ कर चलो अपने-अपने अन्तःपुर में अकेले अकेले"

रामनारायण सोनी

प्रतिक्रिया
श्री गौरीशंकर दुबे

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।
अपने अधीन किये हुए अन्त:करण वाले साधक की इन्द्रियाँ उसके वश में होती है और उनमें राग-द्वेष का अभाव होता है ऐसी इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ वह साधक अन्त:करण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है।
गीता के इसी संदेश का विवेचन आपके इस चिंतन में है।मन को निर्विचार, संकल्पवान्, सुस्पष्ट बनाने का आग्रह है।

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चिंतन का आधार
गुरवाणी में स्पष्ट किया है कि वहां अनहद वाणी बज रही है। जरूरत है उस स्थान को जानने की, जहां वह अनहद वाणी बज रही है।
पंच सखी मिलि मंगलु गाइआ।
अनहद बाणी नादु वजाइआ॥
जब अनहद वाणी का नाद हमारे अंतर में बजता है, तभी हमारे अंदर में हमारे पांचों मित्र-दया, क्षमा, शील, संतोष एवं सत्य प्रसन्न होकर हमारे लिए आनंद का मार्ग खोल देते हैं।
लेकिन यह अनहद वाणी कैसे प्राप्त होती है?
पूरे गुर ते महल पाइआ पति परगटु लोई। नानक अनहद धुनी दरि वजदे मिलिया हरि सोई॥
श्री गुरु अमरदास जी कहते हैं कि वहां अनहद वाणी बज रही है, वह धुन बज रही है। जब हमें प्रभु के परम तत्व ज्ञान की प्राप्ति होती है, इस संबंध में कहा है-
द्रिसटि भई तब भीतरि आइओ मेरा मनु अनदिनु सीतलागिओ।
कहु नानक रसि मंगल गाए सबदु अनाहदु बाजिओ॥
श्री गुरु अर्जुन देव जी कहते हैं कि जब अंतर्दृष्टि खुलती है तभी अंतर्जगत में प्रवेश कर मन को शांति मिलती है। तभी प्रभु के निर्मल गायन को जान सकते हैं, जब अनहद शब्द की ध्वनि सुनाई देती है।

पिंजर प्रेम प्रकासिया एक समीक्षा

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[13/07, 10:38] Gauri Shankar Dubey: आदरणीय सोनी जी,
         सादर अभिवादन।
पिंजर प्रेम प्रकासिया का प्रथम भाग पढा, अलौकिक आनन्द की अनुभूति हुई।
संस्कृत, हिन्दी, मुस्लिम, एवं पाश्चात्य विद्वानों के विचारों को उद्धृत करते हुए प्रेम अतुल्य है, निर्विकल्प है, तथा उसकी अनिर्वचनीयता का विस्तार से वर्णन किया है।प्रेम के प्रादुर्भाव, उसके विविध सोपान, और प्रेम की परिपक्व अवस्था में उसकी भावदशा,भावधाराओं तथा पूर्वराग,मिलन और विरह की स्थितियों का विद्वत्तापूर्ण विश्लेषण किया है।
शबरी,भरत,सुतीक्ष्णजी आदि भक्तों की प्रेम भावना काम अच्छा चित्रण किया किन्तु प्रेम की पराकाष्ठा व्रज की गोपिकाओं में मिलती है उनका उल्लेख कैसे छूट गया? गोपियों के प्रेम के आगे उद्धवजी का ब्रह्मज्ञान तिरोहित हो गया और वे स्वयं प्रेम के सरोवर में डुबकी लगाने लगे।इसका वर्णन श्रीमद्भागवत में, सूरदास जी के भ्रमरगीत में, तथा जगन्नाथ दास रत्नाकर के उद्धवशतक में बहुत सुन्दर है।
ध्वनि सिद्धांत का भी आपने उपनिषदों के आधार पर, एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बहुत अच्छा विवेचन किया है।
यह पुस्तक आपके गहन अध्ययन एवं चिंतन की परिचायक है।
हिन्दी साहित्य भण्डार में आपकी यह रचना एक अमूल्य, अद्वितीय, एवं अनुपम रत्न है।
                   सधन्यवाद।
                             भवदीय
                        गौरीशंकर दुबे।
[17/07, 06:41] Gauri Shankar Dubey: आदरणीय सोनी जी,
             सादर अभिवादन।
पिंजर प्रेम प्रकासिया का द्वितीय भाग पढ़ने पर सुखद अनुभूति हुई। देवनागरी लिपि और वर्णमाला के संबंध में अच्छी जानकारी दी। हिन्दी के स्वर एवं व्यंजन वर्णों का चौदह मन्वंतर,द्वादश आदित्य,एकादश रुद्र, आदि से संबंधित तालिका में शोधपूर्ण नवीन जानकारी मिली। उपनिषद् के अनुसार वाणी की महत्ता तथा वैदिक मन्त्रों के उच्चारण की शुद्धता आदि पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला है।
दृष्टि और दृष्टा में आपने दृश्येन्द्रिय की संरचना और कार्यप्रणाली का शरीरविज्ञान की दृष्टि से विवेचन करते हुए स्पष्ट किया है कि भिन्न-भिन्न विचारों,भावों, अवधारणाओं के अनुसार एक ही दृश्य पर अलग अलग व्यक्तियों का अलग-अलग दृष्टिकोण होता है तदनुसार अनुभूति होती है। अतः आध्यात्मिक चिंतन से ही हमारा दृष्टिकोण शुभ हो सकता है।इस विषय पर मानस और गीता को उद्धृत करते हुए दार्शनिक विचार व्यक्त किए गए हैं।
भगवद्भक्ति, पूजा, स्तुति को भी संवाद माना है। संवाद के माध्यम से ही गीता और मानस का ज्ञान नि:सृत हुआ है।वादे वादे जायते तत्त्वबोध:। अतः आत्मोद्धार के लिए संवाद की आवश्यकता को प्रतिपादित किया है।।
जन्म, मृत्यु,जरा,व्याधि ये चारों ही दोष है।एक चेतन आत्मा को छोड़कर संसार की ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसमें ये चारों दोष न हो। अतः अध्यात्म ज्ञान होने पर ही जीव का कल्याण है।
इस मिथ्या जगत् में रहते हुए ही हमें परम सत्य को जानना है। इसके लिए हमारी धारणाएँ , विचार शुभ हो।शुभ सुने,शुभ सोचे।जीवन में सकारात्मकता लाएँ।
बहुत दिनों बाद श्रेष्ठ रचना पढ़ने को मिली इसके लिए मैं आपका हृदय से आभारी हूँ।

पुस्तक की समीक्षा

आदरणीय सोनी जी,
                  सादर वन्दे।
आपकी कृति "जिन्दगी के केनवास"काव्य-संकलन पढ़ते ही मन प्रसन्न हो गया।इन कविताओं में गहन जीवन-दर्शन के साथ जिन्दगी के हर फलक को छूने की कोशिश की गई है।
ईश्वर की सर्वव्यापकता और उनके चरणों में अनुराग के लिए अपने मन को संबोधित करते हुए कवि की भावना है---
कण कण में सौन्दर्य उसी का
उस पावन का गान किए जा
रे मन-मधुप मौन तू रहकर
प्रभु पद-पद्म-पराग पिए जा।
""सबका सिरजनहार प्रभु तू""तथा""सोहं सोहं बोल""शीर्षक कविताएँ कबीरदास जी की शैली में है। इनमें हठयोग साधना द्वारा ब्रह्मरन्ध्र में अनहद नाद के असीम आनन्द की अनुभूति के लिए जीव से आग्रह है।
उपनिषद् के""द्वा सुपर्णा सयुजा सिखाया:----"तथा गीता के""द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च---""का भाव इन पंक्तियों में है--
एक डाल पर दो पंछी
खट्टे मीठे फल खाता तू
निज स्वरूप को भूला तू
अब सोहं सोहं बोल।
आपकी कविता में प्रभु के प्रति कृतज्ञता का भाव है--
तुम अकारण ही कृपा इस जीव पर जो कर रहे हो
यह रहे विश्वास अविचल,जब तलक जीवन रहे।
ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति--तथा जानत तुम्हहि तुम्हहि होई जाई का वेदान्त दर्शन इन पंक्तियों में देखिए---
यात्रा है स्वयं में लौटने की
तुममें खोना चाहता था।सो मैं खो गया।
कवि की वाणी की ताकत का चित्रण इन पंक्तियों में---
कवि जब उठ जाएगा
पाषाण पिघल जाएगा
हुंकार सुनेगा जब लोहा भी
खुद शोणित बन जाएगा।
माँ मेरा अभिमान तू--में माता के प्रति कृतज्ञता का भाव है।
मातृत्व बीज---में बेटी के प्रति सम्मान का भाव है जिसमें मातृत्व के बीज है। जिसमें नव संस्कृति के आकार ढल रहे हैं।
आतंकवाद--कविता में आतंक के विरुद्ध शक्ति के संधान का आह्वान है।
कविता ने जगा दिया---, में वैभव विलास के जीवन से हट कर दीन-हीन गरीबों के प्रति संवेदना का भाव है।
बरगद और वाशिंदे---में किसी को आश्रय दे कर, असहाय की सहायता करके आनन्दित होने का संदेश है।
यह पेड़ भी बड़ा अजीब है---में वृक्ष की पुकार है--
असमय मत मारो
मेरे बिन इस जग में कैसे जी पाओगे।
पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करने वाली रचना है।
लुढ़कते आँसू दरकते सवाल----कविता में मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति है--
उसे काँटा लगे तो यहाँ चुभन चाहिए।
जिन्दगी के नौ रंग---में सुख दु:ख,हर्ष शोक,त्याग, शांति,क्षमा, उदासी भरी जिंदगी के रंगों में कवि चाहता है--
रंग कोई भी रहे,नियति का यह मान है
धर्म की सद् राह चलना यही बस आन है।
राजपथ के राहियों से तोलना मत--कविता में धरा पर रहने वालोंं की शिखर पुरुषों से तुलना नहीं अर्थात् कवि जमीन से जुड़ा हुआ मानव है वह आम जन जीवन में घुल-मिल कर रहना चाहता है।
इसी प्रकार प्रेम, सामाजिक उत्थान, विश्वशांति, और जीवन के आदर्शों का संदेश देने वाली कविताएँ मन पर गहरा प्रभाव डालने वाली है।
आपकी कविताओं में अंतरंग अनुभूतियों की सहज अभिव्यक्ति है।जीवन के यथार्थ को आत्मपरक सत्य के रूप में उद् घाटित किया है।शब्द,भाव, भाषा, और अभिव्यक्ति की दृष्टि से आपकी यह कृति अद्वितीय है।
हो सकता है मैं आपकी कविताओं के भावों को सही रूप में नहीं समझ पाया हूँ ।फिर भी यथामति अपने विचार लिखने की धृष्टता की है।त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ।
हार्दिक शुभकामनाओं सहित।
                               भवदीय
                     गौरीशंकर दुबे।

समीक्षक गौरीशंकर दुबे

लघु काल-चिन्तन ५३ "अन्तःपुरी" कोई व्यक्ति बगीचे से गुजर जाए वहाँ खिले हुए फूलों को जरा भी न छुए फिर भी हवा में तैर रहे पराग कणों...